प्रदेश विशेष
दिल्ली की कुर्सी .............क्या कांटों भरा ताज
नई दिल्ली,07/जुलाई/2018/ITNN>>> धरना और आंदोलनों से पैदा हुई आम आदमी पार्टी और बाद में बनी दिल्ली सरकार शुरू से ही संकट के दौर से गुजर रही है। आलम यह है कि प्रदेश में अधिकारियों व कर्मचारियों के ट्रांसफर एवं प्रमोशन से उठा सियासी उठा पटक थमने के बजाय थप्पड़ कांड़ तक पहुंच गया। ये मामला दिलचस्प इसलिए बना हुआ है क्योंकि यह प्रदेश के साथ-साथ राष्ट्रीय राजधानी का भी है,और शुमार हो भी क्यों नहीं ...नाम भी तो है "झाड़ू वाली सरकार"। अपने चुनावी वादों में की गई घोषणाओं को तथा दिल्लीवासियों की समस्याओं को सफाया कर पाने में नाकाम सरकार अब कानूनों का सफाया करने में तुली हुई है। 

हालाकिं सरकारें सत्ता में आने के बाद कुछ न कुछ कारनामें अवश्य करती हैं किंतु कानून की सीमाओं को लांघकर नहीं किंतु आप में कुछ ऐसे  ही नजारे देखने को मिल रहे हैं जो बेहद चिंतनीय है। अगर इन घटनाओं का जिक्र किया जाय तो पता चलता है दिल्ली सरकार के आधे दिन विकास के बजाय धरना-आंदोलनों में ही गुजर गए। यानि दिल्ली के जंतर-मतंर फैक्ट्री से उपजी पार्टी सरकार अपनी हरकतों की सीमा को इस कदर लांघा कि प्रदेश के उप राज्यपाल अनिल बैजल के निवास पर पर सीएम समेत अन्य मंत्री लगातार 10 दिनों की जबरन भूख हड़ताल की जो बेहद शर्मनाक और दुर्भाग्य भी है।

इस पर तो दिल्ली हाईकोर्ट को सख्त लहजे में टिप्पणी भी करनी पड़ी थी। यह इतिहास की पहली घटना है कि जब कोई स्थानीय सरकार को अपनी मांगों को मनबाने के लिए केंद्रीय सत्ता पक्ष की सरकार के खिलाफ सड़क पर आना पड़े। किंन्तु यह सच्चाई है। ऐसे में जनता के जेहन में बार-बार यही सवाल उठता है कि आखिरकार दिल्ली सरकार को दिल्ली दरबार के खिलाफ सड़क पर क्यों आना पड़ा ? यह जांच का विषय का अवश्य है। आरोप-प्रत्यारोप के दौर में जुबानी वार,माफीनामा की गंगा,20 विधायकों की सदस्यता पर मंडराता खतरा,पार्टी में आपसी फूट तक तो ठीक है किंतु आम जनता के द्वारा जल हेतु मटकी फोड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाना यह दर्शाता है कि सरकार आम मुद्दों पर कितनी सजग है।

दिल्ली सरकार का सफरनामा पूर्व उप राज्यपाल नजीब से अजीब जंग के साथ शुरू हुआ था जो अब भी लेफ्टिनेंट गर्वनर अनिल बैजल के साथ हिट एंड ट्रायल में जारी है तथा पूर्व सीएस के दफ्तर में जड़े ताले वाला मामला सार्वजनिक ही है वर्तमान कार्यपालिका से छत्तीस का आंकडा सबको नजर ही आ रहा है और विपक्ष शुरू से ही इन सब मामलों को लेकर हमलावर है। पूर्व में हाईकोर्ट के द्वारा उप राज्यपाल को प्रशासनिक मुखिया घोषित होने पर सरकार को गहरा झटका लगा था किंतु सुप्रीमकोर्ट अभी हाल ही में प्रदेश का वास्तविक मुखिया तथा जवाबदेह लेफ्टिनेंट गर्वनर को नहीं बल्कि जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को बताया है। 

गौरतलब है कि इससे सरकार को राहत भरी सांस हेतु ऑक्सीजन जरूर मिला है किंतु पूर्ण राहत नहीं अर्थात दिल्ली अब भी केंªदशासित प्रदेश ही रहेगा, हां यह बात जरूर आप सरकार के लिए नागवार गुजर रही है किंतु यहां यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि "दिल्ली सरकार के पास पद तो है किंतु पावर नही"। उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यसीय वेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि दोनों तालमेल बनाकर ही शासन का संचालन करें , एक-दूसरे पर रोड़ा न अटकाएं,विधिसम्मत ही कार्यों का निर्धारण करें। 

कोर्ट ने दो टूक चेतावनी देते हुए जरूर कहा है कि सभी पक्षकार अपनी-अपनी सीमाओं में ही रहना होगा तथा राज्यपाल के संबंध में एक तर्क जरूर दिया है कि यह मंत्री परिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य होता है किंतु विवाद की दशा में विशेष मामलों को ही राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है अन्यथा आपस में ही सुलझाने होंगें मामले। कोई भी कार्य करने से पहले यह देखना होगा कि यह कार्य जनहित में कितना लाभकारी है। अब देखना ये है की केजरीवाल इन सब मामलों पर उप राज्यपाल से कैसे पेश आते हैं और दिल्ली की जनता को कैसे राहत देते हैं या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमले बाजी कर सिर्फ टाइम पास करते हैं ?