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छत्तीसगढ़ में 76 CRPF जवानों की हत्या का मामला: सबूत न मिलने के कारण सभी आरोपी हाईकोर्ट से बरी

Insight TV Admin by Insight TV Admin
May 9, 2026
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छत्तीसगढ़ में 76 CRPF जवानों की हत्या का मामला: सबूत न मिलने के कारण सभी आरोपी हाईकोर्ट से बरी
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रायपुर
 छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 2010 के ताड़मेटला माओवादी हमले मामले में सभी आरोपियों की रिहाई के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। इस हमले में 76 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। अदालत ने अपने फैसले में प्रत्यक्ष सबूतों की कमी और जांच में प्रक्रियागत खामियों का हवाला दिया है।

जांच में गंभीर खामियां नजर आईं
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एक खंडपीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें आरोपियों को बरी कर दिया गया था। पीठ ने जांच और अभियोजन पक्ष की कार्रवाई में गंभीर खामियों की ओर भी इशारा किया है। यह आदेश पांच मई को पारित किया गया था और गुरुवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।

सीआरपीएफ कर्मियों पर बड़ा हमला
आदेश में कहा गया है कि सीआरपीएफ कर्मियों पर हुए एक बड़े हमले के मामले में आरोपियों की रिहाई को बरकरार रखा गया। ऐसा प्रत्यक्ष सबूतों की कमी कि परिस्थितिजन्य सबूतों के अधूरेपन, जांच में प्रक्रियागत खामियों और अपराध की गंभीरता के बावजूद, आरोपियों के दोष को 'उचित संदेह से परे' साबित करने में अभियोजन पक्ष की विफलता के कारण किया गया है।

अप्रैल 2010 में हुआ था हमला
यह मामला छह अप्रैल, 2010 को हुए माओवादी हमले से जुड़ा है। यह हमला तत्कालीन दंतेवाड़ा जिले के चिंतागुफा पुलिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत ताड़मेटला गांव के जंगलों में हुआ था। यह जगह अब सुकमा जिले में है। सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन का एक दल, राज्य पुलिस कर्मियों के साथ मिलकर इलाके में गश्त पर था। इसी दौरान भारी हथियारों से लैस माओवादियों ने कथित तौर पर उन पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी।

हमले में मारे गए थे 76 जवान
सुरक्षाकर्मियों ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन इस हमले में 76 सुरक्षाकर्मी मारे गए। इनमें 75 सीआरपीएफ के और एक राज्य पुलिस का जवान शामिल था। यह देश में सुरक्षा बलों पर हुए सबसे घातक माओवादी हमलों में से एक था। जांच के बाद, 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ कोंटा स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में आरोप पत्र दायर किया गया। बाद में इस मामले को दंतेवाड़ा स्थित सत्र न्यायालय को सौंप दिया गया।

सभी 10 आरोपियों को कर दिया बरी
सुनवाई के बाद सात जनवरी, 2013 को दंतेवाड़ा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सभी 10 आरोपियों को बरी कर दिया। सत्र अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों पर लगाए गए आरोपों को 'उचित संदेह से परे' साबित करने में विफल रहा है।

आरोपियों पर थें ये धाराएं
आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता, शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों में आपराधिक षड्यंत्र, दंगा करना और हत्या के साथ डकैती डालना शामिल था। बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए, राज्य सरकार ने 2014 में उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी। इस मामले के 10 आरोपियों जिन्हें सत्र अदालत द्वारा बरी कर दिया गया था, में से दो की मौत हो चुकी है।

अहम सबूतों को नहीं समझ पाई अदालत
हाईकोर्ट में महाधिवक्ता विवेक शर्मा और उप महाधिवक्ता सौरभ पांडे ने यह दलील दी कि निचली अदालत अहम सबूतों को ठीक से समझने में नाकाम रही। इन सबूतों में सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज एक आरोपी का इकबालिया बयान और घटनास्थल से बरामद विस्फोटक शामिल थे।

कोर्ट ने गवाही की अर्जी कर दी थी खारिज
राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि अदालत ने सीआरपीसी की धारा 311 के तहत दायर उस अर्जी को खारिज करके गलती की, जिसमें हमले के चश्मदीद गवाह रहे सीआरपीएफ के सात घायल जवानों की गवाही कराने की मांग की गई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने यह कहा कि आरोपियों को हत्याओं से जोड़ने वाला कोई सीधा सबूत या चश्मदीद गवाह की गवाही मौजूद नहीं थी, और किसी भी चश्मदीद गवाह ने उन्हें अपराधी के तौर पर नहीं पहचाना था।

सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिया गया कथित इकबालिया बयान किसी भी स्वतंत्र सबूत से पुष्ट नहीं होता है।

घटनास्थल से नहीं बरामद हुए हथियार
वहीं, अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा जिन विस्फोटकों और हथियारों का जिक्र किया गया था, वे अपराध स्थल से बरामद हुए थे, न कि आरोपियों के कब्ज़े से, साथ ही, जब्त की गई चीजों के विस्फोटक होने की पुष्टि करने वाली फ़ॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट भी अदालत के सामने पेश नहीं की गई थी।

अदालत ने की तीखी टिप्पणी 
इसके साथ ही खंडपीठ ने कहा कि यह देखकर अत्यंत पीड़ा होती है कि सीआरपीएफ के 75 कर्मियों की जान जाने के बावजूद, जिसमें राज्य पुलिस का एक सदस्य भी शामिल था, कथित तौर पर नक्सलियों द्वारा किए गए एक क्रूर हमले में, अभियोजन एजेंसियां अपराध के असली अपराधियों की पहचान स्थापित करने या इस तरह के बर्बर कृत्य के लिए उन्हें न्याय के दायरे में लाने में सक्षम नहीं हुई हैं।

विश्वसनीय सबूत नहीं पेश किया
अदालत ने कहा कि हमें यह देखकर भी उतना ही दुख हुआ कि इतने गंभीर मामले को, जिसमें बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ और राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हुआ, अंततः इस तरह से निपटाया गया कि आरोपियों के खिलाफ कोई भी कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय सबूत पेश नहीं किया जा सका। नतीजतन, निचली अदालत को उन्हें बरी करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

इन परिस्थितियों में, हमारे पास यह मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं है कि निचली अदालत द्वारा पारित बरी करने के आदेश को विकृत, अनुचित या तर्क या न्यायिक औचित्य को चुनौती देने वाला नहीं कहा जा सकता।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने जांच में पाई गई कमियों पर चिंता जाहिर की और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि भविष्य में होने वाली गंभीर अपराधों की जांच में, खासकर उन मामलों में जिनमें बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ हो और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो, जांच के उच्च मानकों को सुनिश्चित किया जाए।

अदालत ने राज्य को यह निर्देश भी दिया कि वह जांच की क्षमता को बेहतर बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करे और भविष्य के मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि प्रक्रियागत चूकों को रोकने, पीड़ितों को न्याय दिलाने, 'निर्दोष होने की धारणा' को बनाए रखने और आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए ऐसे उपाय आवश्यक हैं।

Tags: CRPF
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