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UNSC में 50 साल पहले मिली हार से आज की कूटनीतिक बढ़त तक, भारत के बदले वैश्विक समीकरण की कहानी

Insight TV Admin by Insight TV Admin
July 15, 2026
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UNSC में 50 साल पहले मिली हार से आज की कूटनीतिक बढ़त तक, भारत के बदले वैश्विक समीकरण की कहानी
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नई दिल्ली
इस वक्त भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अपनी दावेदारी मजबूत करने जा रहा है, जो बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य और राजनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है. जब दुनिया पश्चिम एशिया तनाव और यूक्रेन युद्ध से जूझ रही है, भारत ने 2028-29 के लिए UNSC के अस्थायी सदस्य पद का चुनाव अभियान आधिकारिक रूप से लॉन्च कर दिया है. साउथ एशिया की अहम धुरी बन चुका भारत आज एक मजबूर स्थिति में है, लेकिन 70 के दशक का वो दौर भी था, जब भारत को पाकिस्तानी कूटनीति के आगे हार माननी पड़ गई थी. दिसंबर 1971 की जीत के बाद भारत, दक्षिण एशिया का बड़ा खिलाड़ी बन चुका था. बांग्लादेश का बनना, पाकिस्तान की सेना की शर्मनाक हार और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती आवाज ने ये उम्मीद पैदा कर दी थी कि अब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भी कम से कम प्रभावी अस्थायी स्थान बना लेगा पर हुआ कुछ अलग ही। 

1975 में, जब UN जनरल असेंबली ने 1976-77 के लिए नॉन-परमानेंट सदस्य चुनने की प्रक्रिया शुरू की, तो एशियाई ग्रुप की एक सीट पर फिर भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी टक्कर हो गई. यहां नतीजा अलग रहा और भारत को रणनीतिक पीछे हटना पड़ा. पाकिस्तान ने उस वक्त ये सीट हासिल कर ली और यह घटना आज भी भारत की कूटनीतिक यादों में एक महत्वपूर्ण सबक के रूप में दर्ज है. खासकर जब भारत 2028-29 के लिए UNSC नॉन-परमानेंट सदस्यता और उसके साथ आने वाली अस्थायी प्रेसिडेंसी के लिए कैंपेन चला रहा है, तो भारत की ये चूक भूली नहीं जा सकती है. हम यूएनएससी की अस्थायी सदस्यता की ओर जैसे ही देखते हैं, तो 1975 की ये जियोपॉलिटिक्स जेहन में ताजा हो जाती है। 

क्या थे 1975 के हालात?
1971 की जंग के बाद पाकिस्तान टूटा हुआ और अपमानित महसूस कर रहा था. उसके पास परमाणु कार्यक्रम की दिशा में तेजी आई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समर्थन सीमित था. वहीं भारत, इंदिरा गांधी के नेतृत्व में नॉन अलाइड मूवमेंट (NAM) में सक्रिय था और विकासशील देशों का चैंपियन बनने की कोशिश कर रहा था. UNSC में अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव हर दो साल में होते हैं. एशिया-पैसिफिक ग्रुप को आमतौर पर दो सीटें मिलती हैं, जिनमें से एक अरब या मुस्लिम देशों और दूसरी अन्य एशियाई देशों के बीच घूमती रहती है. 1975 में, मौजूदा सदस्यों में इराक का कार्यकाल खत्म हो रहा था. जनरल असेंबली के 30वें सत्र में 20-23 अक्टूबर को मतदान हुआ. अन्य क्षेत्रों की सीटें (अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप) पहले ही तय हो चुकी थीं – बेनिन, लीबिया, पनामा और रोमानिया आसानी से चुने गए. अब बची सिर्फ एशियाई सीट, जहां भारत और पाकिस्तान मुख्य दावेदार थे. फिलीपींस ने भी शुरुआत में दावा किया लेकिन बाद में पीछे हट गया। 

8 राउंड चला चुनाव का ड्रामा
इसके लिए चुनाव की प्रक्रिया सरल नहीं थी, जिसमें कुल 8 राउंड हुए. UNGA में दो-तिहाई बहुमत जरूरी था, यानि कुल 140 से ज्यादा सदस्यों में से लगभग 93-94 वोट्स जरूरी थे. पहले राउंड में रोमानिया, दहोमे, पनामा और लीबिया आसानी से चुने गए. एशियाई सीट पर भारत को 60 वोट मिले, पाकिस्तान को 59, फिलीपींस को भी कुछ वोट मिले, जो पर्याप्त नहीं थे. फिर अगले राउंड्स में भी वोटिंग जारी रही. भारत और पाकिस्तान के बीच वोटों का अंतर करीब 10-20 का रहा. कुल 8 राउंड मतदान होने के बाद 23 अक्टूबर तक प्रक्रिया जारी रही. इस दौरान कूटनीतिक गतिविधियां भी चल रही थीं. कई देशों के प्रतिनिधियों ने अपील की कि एक देश पीछे हट जाए ताकि सहमति बन सके. कुवैत के प्रतिनिधि ने खासतौर पर अपील की और भविष्य में समर्थन का आश्वासन दिया. मिस्र, ईरान, अल्जीरिया, ईराक, थाईलैंड, मॉरिशस और अर्जेंटीना जैसे देशों ने भी यही अपील दोहराई और आखिरकार भारत के स्थायी प्रतिनिधि जयपाल ने नाम वापस ले लिया. उन्होंने कहा कि भारत भविष्य के चुनाव में समर्थन की उम्मीद रखता है. इस पर पाकिस्तान के प्रतिनिधि अखुंद ने भारत का शुक्रिया अदा किया और भविष्य में समर्थन का वादा किया. इस तरह आखिरी राउंड में पाकिस्तान को 123 वोट मिले और वह निर्विरोध चुना गया। 

क्यों 1975 में हार गया भारत?
    एशियाई ग्रुप में मुस्लिम और अरब देशों का ब्लॉक उस वक्त पाकिस्तान के पक्ष में मजबूत था. 1970 के दशक में OIC यानि ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन का प्रभाव बढ़ रहा था. कई अफ्रीकी-एशियाई देश भी पाकिस्तान को इस्लामिक सॉलिडैरिटी के नाम पर सपोर्ट कर रहे थे। 

    एक मसला ये भी था कि पाकिस्तान, अमेरिका और चीन के करीब था, जबकि भारत सोवियन यूनियन यानि रूस के साथ था. हालांकि NAM में भारत की स्थिति मजबूत थी, लेकिन UNGA में वोटिंग में कई छोटे देशों ने पाकिस्तान को प्राथमिकता दी।

    ऐसे में भारत ने लंबे संघर्ष से बचने के लिए पीछे हटने को ही बेहतर विकल्प माना. चूंकि 1975 में भारत आर्थिक चुनौतियों और आंतरिक इमरजेंसी से जूझ रहा था, ऐसे में वो UNSC सीट के लिए किसी भी लड़ाई में उलझने से बचना चाहता था। 

    इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सीख ये था कि सभी देशों की ओर से जो भविष्य के समर्थन की बात कही गई, वो सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता थी, जो कभी नहीं हुआ. ये कदम भारत के लिए बड़ा सेटबैक बनकर उभरा। 

कल की चूक, आज की सीख
भारत अब G4 (भारत, जर्मनी, जापान, ब्राजील) के साथ स्थायी सदस्यता की मांग करता है, लेकिन अस्थायी सीट के लिए भी रोबस्ट कैंपेन जरूरी है. 1975 में भारत ने पीछे हटकर अपनी गरिमा बचाई थी लेकिन आज की स्थिति अलग है. भारत, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पीसकीपिंग में सबसे बड़ा सहयोगी है और ग्लोबल साउथ की एक मजबूत आवाज है। 

SHANTI (Securing Holistic Advancement through Norms, Trust and Integrity) जैसी पहल के साथ भारत न सिर्फ सीट जीतने, बल्कि UNSC के सुधार करने का नैरेटिव सेट कर रहा है. 1975 की वो रात UN हॉल में भारत के प्रतिनिधि के पीछे हटने के भाषण ने एक चैप्टर बंद कर दिया था, लेकिन कहानी अब भी जारी है. पाकिस्तान ने 1976-77 में अपनी सदस्यता का इस्तेमाल कश्मीर के मुद्दे को उठाने के लिए किया, जबकि भारत ने बाहर रहकर भी अपनी आवाज बनाए रखी. आज भी पाकिस्तान UNSC में है, वो 2025-26 का टर्म, और जुलाई 2025 में प्रेसीडेंसी ले चुका है, ऐसे में भारत को पिछली घटनाओं से सबक से सीखकर, मजबूत गठबंधनों और कूटनीति से आगे बढ़ना है। 

कुल मिलाकर 1975 की हार वाकई हार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक स्टॉप थी. आज 50 साल बाद भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत इस बात की गवाही है कि लंबे खेल में जो सही मंसूबे के साथ आगे बढ़ता है, वो जीतता है. UNSC की अस्थायी प्रेसिडेंसी सिर्फ एक कुर्सी नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने का प्लेटफॉर्म है. ऐसे में भारत को अब चूकना नहीं चाहिए। 

Tags: top-newsUNSC
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