राजेश भाटिया,संपादक, ,इनसाइट टीवी न्यूज़ नेटवर्क
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने राज्य की राजनीति के पूरे पावर-मैट्रिक्स को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। 243 सीटों वाली विधानसभा में एनडीए का 200+ सीटों के ऐतिहासिक आँकड़े तक पहुँचना केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत मात्र नहीं, बल्कि शासन-मॉडल की पुनर्पुष्टि का स्पष्ट संदेश है। यह परिणाम किसी संयोग का फल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व, सूक्ष्म रणनीति, मजबूत ग्राउंड एग्ज़िक्यूशन और बदलते वोटर-बिहेवियर का संयुक्त प्रभाव है।
इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक आकर्षण और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की स्थानीय गवर्नेंस क्रेडिबिलिटी एक ही फ्रेम में अभूतपूर्व तरीके से स्थापित हुई। दोनों नेताओं की “स्थिरता + डिलीवरी” वाली संयुक्त पोज़िशनिंग ने बिहार के मतदाताओं को एक स्पष्ट, भरोसेमंद विकल्प दिया और जनता ने इसे निर्णायक जनादेश के रूप में स्वीकार भी किया।
जहाँ केंद्र ने चुनावी नैरेटिव को दिशा दी, वहीं मैदान में एनडीए के स्टार कैंपेनरों ने इस नैरेटिव को ठोस राजनीतिक लाभ में परिवर्तित किया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा हों या कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान- दोनों ने अपने सॉफ्ट-टच, स्थिर संवाद, इमोशनल कनेक्ट और लो-टेम्पो लेकिन हाई-इम्पैक्ट शैली वाले कैंपेन से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में एनडीए की सामाजिक पकड़ को और गहरा किया।
लेकिन इस चुनावी परिदृश्य में जो नाम सबसे उभरकर सामने आया, वह है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव । डॉ. यादव ने 25 लक्षित सीटों में से 22 पर विजय दिलाकर यह सिद्ध किया कि चुनाव सिर्फ भीड़ जुटाने का खेल नहीं, बल्कि वैज्ञानिक माइक्रो-मैनेजमेंट और समुदाय-विशिष्ट रणनीति की कला है। यादव-बहुल क्लस्टर्स, जो परंपरागत रूप से एनडीए के लिए चुनौती थे, इस बार निर्णायक रूप से एनडीए के पक्ष में झुके।
इस बदलाव का बड़ा श्रेय जाता है डॉ. यादव की लोकलाइज्ड मैसेजिंग, आक्रामक लेकिन सौम्य जनसंपर्क, समुदाय-विशेष से संवाद, और सामाजिक संतुलन को नए सिरे से गढ़ने वाली रणनीति को।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं इस विजय का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व को देते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली की जीत के बाद बिहार का यह जनादेश एक बार फिर मोदी नेतृत्व की ताकत को सिद्ध करता है।
भाजपा की चुनावी रणनीति का केंद्रीय स्तंभ रहे गृह मंत्री अमित शाह का संगठन कौशल इस चुनाव में एक बार फिर निर्णायक साबित हुआ। मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से लेकर बूथ-स्तर की माइक्रो-प्लानिंग, पाँच जोन में विभाजित चुनावी संरचना, विभिन्न राज्यों से वरिष्ठ नेताओं की तैनाती, और छठ पर्व को व्यापक जनसंपर्क अभियान की तरह उपयोग करना- इन सभी प्रयासों ने एनडीए के वोट-कंसोलिडेशन को ऐतिहासिक मजबूती प्रदान की। नाराज़ सामाजिक वर्गों को उनके ही समुदाय के प्रभावी नेताओं के माध्यम से साधना, जदयू–लोजपा के बीच समन्वय को सहज बनाना, और पूरे गठबंधन को बराबरी का सम्मान देना- ये सभी घटक इस रणनीति की सफलता के मूल में थे।
दूसरी ओर, महागठबंधन संगठित रणनीति, समन्वय और नैरेटिव-सेटिंग के स्तर पर पिछड़ गया। असंगत मुद्दों की प्रस्तुति, नेतृत्व का अभाव और ग्राउंड पर कमजोर रणनीति ने उनकी चुनौती को अप्रभावी बना दिया। बिहार के मतदाता ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह भावनात्मक नारेबाज़ी के बजाय विकास, स्थिरता और भरोसेमंद नेतृत्व में निवेश करना चाहता है।
बिहार का यह जनादेश सिर्फ राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि उत्तर भारत में उभरते नए नेतृत्व-मैट्रिक्स का संकेत है। मोदी-नीतीश की संयुक्त विश्वसनीयता और डॉ. मोहन यादव का तेजी से उभरता राष्ट्रीय प्रोफ़ाइल यह बताता है कि चुनाव-2025 के बाद का भारतीय राजनीति परिदृश्य नई दिशा की ओर अग्रसर है। इस मॉडल का लाभ अब आने वाले समय में यादव-बहुल उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों में भी देखा जा सकता है।
यह जीत साबित करती है कि बिहार की जनता ने परिवर्तन नहीं – बल्कि स्थिरता, भरोसे और निर्णायक नेतृत्व को चुना है। स्पष्ट जनादेश के साथ मतदाताओं ने न केवल अपनी राजनीतिक पसंद दर्ज की, बल्कि लोकतंत्र की नींव को और अधिक मजबूत किया है।


























