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उत्तराखंड चुनाव 2027: धामी के सामने मिशन रिपीट की चुनौती, कांग्रेस और UKD कितना बिगाड़ेंगे खेल?

Insight TV Admin by Insight TV Admin
June 20, 2026
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उत्तराखंड चुनाव 2027: धामी के सामने मिशन रिपीट की चुनौती, कांग्रेस और UKD कितना बिगाड़ेंगे खेल?
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देहरादून 

उत्तराखंड की सियासत में 'चुनावी बिगुल' बज चुका है. विधानसभा चुनाव होने में आठ महीने से कम का समय बचा है. देवभूमि की सत्ता पर काबिज होने के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जहां इतिहास रचने के इरादे से मैदान में उतरने की तैयारी में है, तो वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) इस बार सत्ता परिवर्तन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। 

70 विधानसभा सीटों वाले इस पहाड़ी राज्य में चुनावी सरगर्मियां चरम पर हैं और हर दल अपनी रणनीतियों को धार देने में जुट गया है। 

कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने में जुटी है. दूसरी ओर क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) भी राज्य निर्माण से जुड़े मूल मुद्दों को लेकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। 

उत्तराखंड में सियासी शह-मात का खेल 
बीजेपी ने 2022 में सत्ता परिवर्तन की रिवायत को तोड़ने में कामयाब रही, जब से उत्तराखंड बना है, 2022 में पहली बार था, जब कोई पार्टी लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने में कामयाब रही. इस पर बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाना चाहती है तो कांग्रेस दस साल से चले आ रहे अपने सियासी वनवास खत्म करने की कवायद में है। 

उत्तराखंड का चुनाव दो ध्रुवीय रहा है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है, लेकिन बसपा से लेकर सपा तक किस्मत आजमाती रही है. इसके अलावा उत्तराखंड राज्य बनवाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले उत्तराखंड क्रांति दल भी पूरे दमदारी के साथ चुनावी तैयारी में जुटी है। 

क्या रहे थे 2022 के चुनावी समीकरण?
आगामी जंग को समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों और सियासी उलटफेरों को देखना बेहद जरूरी है। 

     सीटें और वोट शेयर: 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 44.33% वोट शेयर के साथ 47 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की थी. वहीं, कांग्रेस 37.91% वोट पाकर महज 19 सीटों पर सिमट गई थी. इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 2 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 2 सीटें मिली थीं। 

    'आप' का सूपड़ा साफ: आम आदमी पार्टी (AAP) ने कर्नल अजय कोठियाल (जो अब भाजपा में हैं) को सीएम चेहरा बनाकर बहुत जोर-शोर से चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी का खाता भी नहीं खुला और उसे केवल 3.3% वोटों से संतोष करना पड़ा। 

    दो बड़े सियासी उलटफेर: 2022 के चुनाव ने दो सबसे बड़े दिग्गजों को धूल चटाई थी. कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को लालकुआं सीट से हार का सामना करना पड़ा. वहीं, भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी अपनी पारंपरिक खटीमा सीट से कांग्रेस के भुवन कापड़ी से चुनाव हार गए थे। 

    धामी की चंपावत से वापसी: चुनाव हारने के बावजूद भाजपा आलाकमान ने पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया. इसके बाद दिवंगत भाजपा नेता कैलाश गहतोड़ी ने चंपावत सीट खाली की, जहां हुए उपचुनाव में धामी ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की। 

मंडलों का गणित: कुमाऊं बनाम गढ़वाल
उत्तराखंड की सियासी कुमाऊ और गढवाल में बंटी हुई है. राजनीतिक रूप से दोनों ही क्षेत्र की अपनी सियासी अदावत भी रही है. हालांकि, सत्ता का रास्ता कुमाऊं (29 सीटें) और गढ़वाल (41 सीटें) मंडलों से होकर गुजरता है. पिछले चुनाव में दोनों मंडलों का मिजाज काफी अलग रहा था। 

2022 के चुनाव में गढ़वाल मंडल की 41 सीटों में से भाजपा ने 29 और कांग्रेस ने 8 सीटें जीती थीं. इसके अलावा बसपा दो सीटें और दो सीटें निर्दलीय ने जीती थी. कुमाऊं मंडल की 29 सीटों में से बीजेपी ने 18 और कांग्रेस ने 11 सीटें जीती थीं . इस तरह दोनों ही मंडलों पर बीजेपी का दबदबा रहा। 

उत्तराखंड विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 2022 के चुनाव में भाजपा ने 47 सीटों पर जीत दर्ज कर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी. कांग्रेस 19 सीटों तक सिमट गई थी, जबकि बसपा और निर्दलीय उम्मीदवारों को दो-दो सीटें मिली थीं। 

वोट प्रतिशत के लिहाज से भी भाजपा कांग्रेस से आगे रही थी. भाजपा को 44.33 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के खाते में 37.91 प्रतिशत वोट आए थे. वहीं आम आदमी पार्टी, जिसने कर्नल अजय कोठियाल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा था, कोई सीट नहीं जीत सकी और उसका 

2022 में भाजपा ने गढ़वाल में एकतरफा प्रदर्शन किया था, जबकि कुमाऊं मंडल में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी. यही वजह है कि इस बार दोनों दलों ने इन मंडलों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। 

हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में रैलियां प्रस्तावित थीं. अल्मोड़ा की रैली में भारी भीड़ भी जुटी, लेकिन खराब मौसम के कारण राहुल गांधी वहां पहुंच नहीं सके. कार्यकर्ताओं की मायूसी को देखते हुए उन्होंने अल्मोड़ा की रैली को फोन के माध्यम से और गढ़वाल की रैली को वर्चुअल माध्यम से संबोधित किया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल इन दिनों पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं तथा लोगों से सीधे संपर्क में जुटे हैं। 

भाजपा का 'मिशन 23' और विकास का रोडमैप
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के इतिहास में ऐसे पहले भाजपा सीएम बनने जा रहे हैं, जो अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे. भाजपा इस बार 'एंटी-इंकंबेंसी' को मात देने के लिए माइक्रो-लेवल पर काम कर रही है। 

हारी हुई सीटों पर महा-मंथन: पार्टी ने 13 से 16 जून तक एक बड़ा अभियान शुरू किया है. इसके तहत भाजपा के लोकसभा सांसद, राज्यसभा सदस्य और कोर ग्रुप के वरिष्ठ नेता उन 23 विधानसभा सीटों पर उतर रहे हैं, जहां पिछले चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। 

ये नेता इन क्षेत्रों में न केवल प्रवास करेंगे बल्कि रात्रि विश्राम भी करेंगे. इसके जरिए पार्टी स्थानीय संगठन की सक्रियता का आकलन करेगी और हार के कारणों को समझेगी. इस तरह बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए अपनी मजबूत सीटों के साथ-साथ कमजोर सीटों पर मशक्कत करने में जुट गई है। 

चुनावी मुद्दे और हथियार: भाजपा इस बार बुनियादी ढांचे के विकास, यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लागू करने और धार्मिक पर्यटन विकास (चारधाम यात्रा और मानसखंड मंदिर माला मिशन) को मुख्य मुद्दा बना रही है. इसके अलावा 2027 में हरिद्वार में होने वाला कुंभ मेला भाजपा के लिए जनता के बीच अपनी प्रशासनिक और विकासपरक छवि को चमकाने का सबसे बड़ा मौका होगा। 

कांग्रेस की डगर: मुद्दे अनेक, पर गुटबाजी से है संताप- कांग्रेस इस बार सरकार को घेरने के लिए पूरी तरह आक्रामक है. प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल लगातार जमीन पर संघर्ष करते दिख रहे हैं और सभी नेताओं को एकजुट करने में जुटे हैं. इसके अलावा सात महीने हो गए हैं, लेकिन प्रदेश कार्यकारिणी का गठन नहीं हो सका। 

कांग्रेस की प्रभारी कुमारी शैलजा  दो दिन के कार्यक्रम के लिए पहुंची, लेकिन एक ही दिन में निपटाकर दिल्ली वापस लौट गई. चुनावी तैयारियों के बीच प्रदेश संगठन का न होना, एक बड़ा सवाल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के लिए बना हुआ है। 

कांग्रेस की चुनौती
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से ज्यादा
'अपनों' से निपटना है. पिछले दिनों पूर्व सीएम हरीश रावत जब 'मौन अवकाश' पर गए थे, तो सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया था. हालांकि, बाद में रावत ने साफ किया कि वह कांग्रेस को जिताने के लिए पूरे दमखम से मैदान में उतरेंगे। 

कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने बातचीत में कहा, "हम पूरी तैयारी के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे. अपने कांग्रेस शासन काल की कानून व्यवस्था से अन्य मुद्दों की तुलना आज की सरकार से करेंगे और जनता के सामने जाएंगे.  हमारी नीतियां ही हमारा चेहरा हैं. लोकतंत्र में सभी नेताओं को बोलने की आजादी है, मुद्दों पर राय अलग हो सकती है, लेकिन हम एकजुट हैं. हम आगामी चुनाव में भाजपा के कुशासन, कानून व्यवस्था की बदहाली और रोजगार के मोर्चे पर उनकी विफलता को जनता के सामने रखेंगे। 

उन्होंने कहा,  'एक साल से कम का समय बचा है और हम सब चुनाव में जा रहे हैं तो कांग्रेस पार्टी निश्चित रूप में कांग्रेस शासन की उपलब्धियों को एक बार फिर जनता के सामने रखकर और वर्तमान में वर्तमान सरकार के नाकामयाबियों को सामने रखकर दोनों के कंपेयर दोनों के तुलनात्मक अध्ययन के साथ जनता के बीच जाएगी. मेरा ये मानना है कि जैसे हम क्षेत्रों में लोगों के साथ मिल रहे हैं तो लोग इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि कांग्रेस ने बढ़िया काम किया था. जहां तक विकास की बात है जहां तक रोजगार की बात है, जहां तक लॉ एंड ऑर्डर की बात है इस के लिए कांग्रेसी सरकार जरूरी है। 

विपक्ष के तरकश के तीर
कांग्रेस इस बार अंकिता भंडारी हत्याकांड,  विभिन्न भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामले, पहाड़ों में बढ़ता पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और जंगली जानवरों से हो रहे जान-माल के नुकसान को बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है। 

यूकेडी (UKD) की हुंकार: क्षेत्रीय अस्मिता और 'मूल निवास' का दांव
उत्तराखंड के राज्य गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) इस बार पूरी मजबूती से वापसी की तैयारी में है. पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष आशुतोष नेगी और युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष आशीष नेगी लगातार जिलों में जनसभाएं कर रहे हैं। 

आशुतोष नेगी ने  बातचीत में अपने तीन सबसे बड़े चुनावी मुद्दों का खुलासा किया, उन्होंने कहा, 'यूकेडी का मानना है कि जब तक पहाड़ में स्थायी राजधानी नहीं बनेगी, तब तक पहाड़ का समग्र विकास नहीं हो सकता. जब मुख्यमंत्री और विधायक पहाड़ में बैठेंगे, तभी बंजर हो रही भूमि आबाद होगी. यूकेडी 'मूल निवास' और सख्त भू-कानून की मांग को लेकर मुखर है. 1950 से यहां रह रहे लोगों को ही मूल निवासी का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए. आज मूल निवासियों को साइडलाइन किया जा रहा है, जिससे युवाओं के रोजगार के अधिकार छिन रहे हैं। 

आशुतोष नेगी ने कहा कि अगर उनकी सरकार आती है और पेपर लीक होता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होगी और सीएम को तुरंत इस्तीफा देना पड़ेगा. आशुतोष नेगी के अनुसार, पार्टी वर्तमान में 30 से 35 सीटों पर बेहद मजबूती से काम कर रही है. उन्होंने यह भी साफ किया कि अगर दूसरे दलों के साफ-सुथरी छवि वाले नेता उनसे जुड़ना चाहते हैं, तो उनका स्वागत है, बशर्ते उनकी क्रेडिबिलिटी पर कोई शक न हो. यूकेडी इस बार युवाओं, मातृशक्ति और पूर्व सैनिकों के सहारे सूबे में बदलाव लाना चाहती है। 

क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?
वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल कहते हैं,  "गढ़वाल की 41 सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है. यूकेडी के आशीष नेगी जमीन पर अच्छा काम कर रहे हैं. यूकेडी जितना मजबूत होगी, वह कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी क्योंकि भाजपा का कोर वोटर फिलहाल इंटैक्ट है. हालांकि भाजपा के खिलाफ नाराजगी है, लेकिन विपक्ष के पास अभी भी पुष्कर सिंह धामी के टक्कर का कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है. हरिद्वार में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है. कुल मिलाकर भाजपा की सीटें पिछली बार से घटेंगी जरूर, लेकिन सरकार बनाने की दौड़ में वह आगे दिख रही है। 

वहीं कुमाऊं मंडल  की सीटों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार गणेश पाठक कहते हैं, "कुमाऊं मंडल में मुकाबला बेहद कांटे का होने वाला है. अगर कांग्रेस ने टिकटों का सही वितरण किया और पार्टी के भीतर बगावत नहीं हुई, तो पहाड़ और मैदान दोनों जगह कांग्रेस को बड़ा फायदा हो सकता है. लेकिन इसके लिए कांग्रेस के 'सभी सरदारों' (दिग्गजों) को अपनी आपसी खींचतान भूलकर एक मंच पर आना होगा. दूसरी तरफ, भाजपा को अपने मजबूत पन्ना प्रमुख स्तर के संगठन का लाभ अभी भी मिल रहा है। 

किस दिशा में बढ़ रही चुनावी लड़ाई?
फिलहाल तस्वीर साफ है. भाजपा विकास, स्थिर नेतृत्व और संगठन की ताकत के भरोसे सत्ता बरकरार रखने की कोशिश करेगी. कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और अंकिता भंडारी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरकर वापसी का रास्ता तलाशेगी. वहीं यूकेडी राज्य आंदोलन से जुड़े पुराने सवालों को फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश करेगी। 

कुल मिलाकर उत्तराखंड का 2027 का चुनाव बेहद रोमांचक मोड़ पर है. जहां भाजपा अपनी सत्ता बचाने के लिए संगठनात्मक चक्रव्यूह रच रही है, वहीं कांग्रेस और यूकेडी जनता की नाराजगी को वोटों में बदलने की फिराक में हैं. ऊंट किस करवट बैठेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आगामी महीनों में कौन सा दल पहाड़ों के बुनियादी मुद्दों को सबसे बेहतर ढंग से उठा पाता है। 

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