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कश्मीर में केसर उत्पादन में गिरावट, किसानों ने सोलर पंप लगाने की उठाई मांग

Insight TV Admin by Insight TV Admin
February 22, 2026
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कश्मीर में केसर उत्पादन में गिरावट, किसानों ने सोलर पंप लगाने की उठाई मांग
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श्रीनगर

कश्मीर में केसर की खेती करने वाले किसान पुलवामा जिले के पंपोर इलाके में सोलर पंप लगाने की मांग कर रहे हैं. यह सोलर पंप नेशनल केसर मिशन के तहत 2008 में लगाए गए खराब स्प्रिंकलर सिंचाई सिस्टम को चलाने के लिए है. इससे 3715 हेक्टेयर कृषि भूमि को फिर से उपयोग में लाया जा सकेगा और मसाले की पैदावार बढ़ाई जा सकेगी.

नेशनल केसर मिशन के तहत कृषि विभाग ने पंपोर केसर बेल्ट और बडगाम में 2,548.75 हेक्टेयर जमीन पर स्प्रिंकलर सिंचाई सिस्टम लगाया, जिसके लिए 400.11 करोड़ रुपये खर्च करके 124 बोरवेल बनाने का प्लान बनाया गया. इस सिस्टम में पानी उठाने वाले पंप को चलाने के लिए डीजल से चलने वाले जनरेटर शामिल थे, जो केसर के खेतों में खोदे गए कुओं से स्प्रिंकलर पाइपों को पानी देते थे ताकि जरूरत पड़ने पर कंद और पौधों की सिंचाई हो सके.

कृषि विभाग ने वर्तमान विधानसभा सत्र में माना कि 124 बोरवेल में से 85 किसानों को दिए गए थे, और उनमें से 77 काम नहीं कर रहे हैं, जबकि सिर्फ आठ काम कर रहे हैं – बडगाम और श्रीनगर में चार-चार. विभाग ने माना कि स्प्रिंकलर सिस्टम के अधिक ऑपरेशनल और रखरखाव खर्च ने उन्हें बेकार कर दिया है.

पंपोर के चंदहारा गांव के एक युवा और शिक्षित किसान सज्जाद उल अकबर ने कहा कि उनके परिवार के पास 2 हेक्टेयर जमीन है, जिसका प्रोडक्शन 2000 में 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से घटकर इस साल 1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गया है, और एक किलोग्राम केसर से एक किसान को करीब 2.8 लाख रुपये मिलते हैं. उन्होंने ईटीवी भारत को बताया, "बेमौसम बारिश फसल के कम उत्पादन के मुख्य कारणों में से एक है. स्प्रिंकलर सिस्टम खराब है. हम सरकार से इस सिंचाई सिस्टम को चलाने के लिए सोलर पंप लगाने की अपील कर रहे हैं, जिससे फसल का उत्पादन बढ़ सकता है."

चंदहरा के एक और किसान एजाज अहमद गनई भी अकबर की बात से सहमत हैं, जिनके परिवार के पास इस इलाके में 3.5 हेक्टेयर जमीन है. गनई ने ईटीवी भारत को बताया, "हमारा उत्पादन 1996 में 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से घटकर इस साल एक किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गया है. कृषि विभाग का लगाया गया स्प्रिंकलर सिस्टम खराब हो गया है क्योंकि कोई उसे चलाता या रखरखाव नहीं करता. हमने विभाग को जमीन के ग्रुप में सोलर पंप लगाने का सुझाव दिया है. किसान इसका रखरखाव और ऑपरेट करेंगे क्योंकि इसमें जनरेटर जैसे फ्यूल का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता. यह हमारे लिए सस्ता और किफायती होगा."

केसर के कंद और पौधों की समय पर सिंचाई की व्यवस्था न होने से, जो मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है, इसके उत्पादन में गिरावट आई. विधानसभा में पेश किए गए कृषि उत्पादन विभाग के डेटा के अनुसार, 2020-2021 में 17.33 मीट्रिक टन (MT), 2021-2022 में 14.87 एमटी, 2022-2023 में 14.94 एमटी, 2023-2024 में 23.53 एमटी और 2024-2025 में 19.58 एमटी का उत्पादन हुआ.

केसर मिशन के तहत, कृषि विभाग ने कहा कि लगभग 2,598 हेक्टेयर जमीन को फिर से तैयार किया गया है, जिससे हाल के वर्षों में उत्पादकता 4.4 किलोग्राम और 6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ी है, जिससे कुल उत्पादन का वित्तीय मूल्य 2020-2021 में 302.35 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-2023 में 564.72 करोड़ रुपये और 2024-2025 में 534.53 करोड़ रुपये हो गया है.

हाल के वर्षों में इस मसाले का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 4.02 किलोग्राम (2022) से 5.27 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के बीच रहा है और इस फसल के तहत कुल खेती की जमीन भी 2010 के 5705 हेक्टेयर से घटकर अब 3715 हेक्टेयर रह गई है.

पंपोर इलाके के दुस्सू गांव में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कश्मीर सैफरन एंड टेक्नोलॉजी सेंटर (IIKSTC) के हेड प्रोफेसर एसए डार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, केसर की जमीन का आवासीय क्षेत्र में बदलना, मिट्टी का खनन और समय पर सिंचाई की कमी की वजह से मसालों की पैदावार में कमी आई है. प्रोफेसर डार ने कहा कि देश में केसर की घरेलू मांग 80 एमटी है.

उन्होंने कहा, "हमने अफगानिस्तान के रास्ते ईरान से 58 एमटी केसर इंपोर्ट किया. कश्मीर केसर का देश में बहुत बड़ा मार्केट है क्योंकि इसमें क्रोसिन की मात्रा अधिक होती है और इसकी गुणवत्ता अच्छी होती है. कश्मीरी केसर अमेरिका, हांगकांग, सऊदी अरब और यूरोपीय देशों में निर्यात किया जाता है. इसलिए, मांग बहुत अधिक है, हमें क्वालिटी प्रोडक्शन बनाए रखना होगा."

उन्होंने कहा कि सिंचाई प्रणाली में जो खामियां केसर मिशन के तहत पूरी तरह से हासिल नहीं हुई हैं, उन्हें पूरा किया जाना चाहिए. उन्होंने ईटीवी भारत को बताया, "हम कंद की गुणवत्ता में सुधार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. हमारा कंद उत्पादन कम है. हमें नर्सरी स्तर पर कंद का उत्पादन बढ़ाना चाहिए. इस उद्देश्य के लिए कृषि विभाग को एक परियोजना प्रस्तुत की गई है."

किसान गनई ने भी शिकायत की कि कंद खरीदने के लिए सरकार एक किसान को प्रति कनाल 25000 रुपये देती है, लेकिन एक कनाल की कीमत 1.50 लाख रुपये है.

पंपोर के विधायक हसनैन मसूदी ने कहा कि असल उत्पादन अब तक के सबसे निचले स्तर, लगभग 1,000 किलोग्राम पर आ गया है, जिससे किसानों और इस बिजनेस से जुड़े स्थानीय व्यापारियों को लगभग 500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. उन्होंने कहा कि केसर मिशन के तहत लगाए गए 124 बोरवेल में से एक भी चालू नहीं था. उन्होंने कहा, "प्रोसेसिंग, GI टैगिंग और मार्केटिंग के लिए स्पाइस पार्क में सिर्फ 10 किलोग्राम केसर लाया गया, जो उप्तादन में बड़ी गिरावट को साफ दिखाता है." उन्होंने केसर को फिर से उगाने के लिए तुरंत और ठोस कदम उठाने की मांग की.

पुलवामा जिले के संबूरा गांव के एक और किसान जावेद अहमद ने कहा कि हाल ही में बीज बोने के मौसम में सूखे की वजह से केसर का उत्पादन कम हो रहा है. अहमद ने ईटीवी भारत को बताया, "सूखी मिट्टी की वजह से कंदों में अंकुरण नहीं हो पाता है. सरकार को स्प्रिंकलर सिंचाई सिस्टम को चालू करने के लिए मॉडर्न टेक्नोलॉजी लानी चाहिए, ताकि हम सूखे के दौरान उनका इस्तेमाल कर सकें. अगर सरकार सिंचाई में मदद करती है तो किसान इसमें दिलचस्पी लेंगे."

कश्मीर के कृषि विभाग के डायरेक्टर सरताज शाह ने बताया कि अधिकारियों ने प्रस्ताव की स्टडी की, लेकिन पाया कि बड़े बोरवेल के लिए सोलर पंप या पैनल लगाना मुमकिन नहीं है.. शाह ने ईटीवी भारत को बताया, "विभाग खराब सिंचाई सिस्टम को ठीक करने के लिए जरूरी खर्च देने की कोशिश कर रहा है. लेकिन किसानों को बाद में सिंचाई सिस्टम इस्तेमाल करने के लिए ऑपरेशन और रखरकाव का खर्च देना होगा."

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