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ईरान युद्ध से तेल बाजार में भूचाल, क्या भारत में महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?

Insight TV Admin by Insight TV Admin
February 28, 2026
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ईरान युद्ध से तेल बाजार में भूचाल, क्या भारत में महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?
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नई दिल्ली
मध्य पूर्व में तनाव अब खुले युद्ध में बदल चुका है। अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले शुरू कर दिए हैं, जिसमें तेहरान समेत कई शहरों में विस्फोट की खबरें हैं। इस घटना ने वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मचा दिया है। क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और दुनिया भर के निवेशक व आम लोग इस बात से चिंतित हैं कि क्या यह आग भारत की जेब तक पहुंच जाएगी? भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, और इसमें से बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों (सऊदी अरब, UAE, इराक आदि) से आता है, जो होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है।

ईरान: एक प्रमुख तेल उत्पादक देश
अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेलने के बावजूद ईरान आज भी दुनिया के शीर्ष 10 तेल उत्पादकों में शामिल है। 'ओपेक' (OPEC) के आंकड़ों के अनुसार, ईरान वर्तमान में लगभग 3.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल का उत्पादन करता है। ग्लोबल रिस्क मैनेजमेंट के मुख्य विश्लेषक अर्ने लोहमैन रासमुसेन के अनुसार, 1974 में ईरान अमेरिका और सऊदी अरब के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक था (6 मिलियन बैरल प्रतिदिन)। ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है। सालों के कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, इसके तेल उद्योग की स्थिति वेनेजुएला जैसे देशों से काफी बेहतर है।

होर्मुज जलडमरूमध्य: सबसे बड़ा खतरा
तेल बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी है, जिसे ठप करने की धमकी ईरान अक्सर देता रहा है। यह मध्य पूर्व के अमीर तेल उत्पादक देशों को शेष विश्व से जोड़ने वाला मुख्य समुद्री मार्ग है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, 2024 में इस मार्ग से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरा, जो वैश्विक खपत का करीब 20 प्रतिशत है। यह जलमार्ग काफी संकरा (लगभग 50 किलोमीटर चौड़ा) और उथला (अधिकतम 60 मीटर गहरा) है।

इस मार्ग पर सुरक्षा को लेकर जरा सा भी संदेह होने पर जहाजों के बीमा प्रीमियम में भारी उछाल आ सकता है। सैक्सो बैंक के विश्लेषक ओले हैनसेन के अनुसार, केवल सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के पास ही वैकल्पिक (बाईपास) बुनियादी ढांचा है, जिसकी अधिकतम क्षमता मात्र 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है।

अत्यधिक लाभदायक तेल और चीन पर निर्भरता
पश्चिमी देशों (कनाडा, अमेरिका) में जहां तेल निकालने की लागत $40 से $60 प्रति बैरल आती है, वहीं ईरान के लिए यह लागत मात्र $10 प्रति बैरल है। 1979 की इस्लामी क्रांति और विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप की अधिकतम दबाव नीति के कारण ईरान के पास निर्यात के बहुत कम विकल्प बचे हैं।

चीन सबसे बड़ा खरीदार
ईरान वर्तमान में 1.3 से 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन निर्यात करता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इसका 80% से अधिक हिस्सा बाजार मूल्य से कम कीमत पर चीनी रिफाइनरियों मुख्यतः स्वतंत्र टीपॉट रिफाइनरियों को जाता है।

पड़ोसी देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
खाड़ी देशों से लेकर तुर्की और पाकिस्तान तक, ईरान के पड़ोसी डरे हुए हैं। चूंकि इन देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, इसलिए वे ईरान के जवाबी हमले के निशाने पर आ सकते हैं। भूमध्यसागरीय सामरिक अध्ययन फाउंडेशन के निदेशक पियरे रज़ौक्स के अनुसार, ईरान के पास मध्यम दूरी की मिसाइलें हैं जो हाइड्रोकार्बन हब, बिजली संयंत्रों और समुद्री जल संयंत्रों को नष्ट कर सकती हैं।

अगर कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल तक पहुंच जाती है (जो फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से नहीं हुआ है), तो इससे दुनिया भर में महंगाई फिर से बेकाबू हो सकती है। तेल की बढ़ती कीमतें इस साल के अंत में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति ट्रंप को नुकसान पहुंचा सकती हैं, क्योंकि उन्होंने अमेरिकी मतदाताओं से सस्ती ऊर्जा का वादा किया है।

भारत पर असर को विस्तार से समझिए
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए इस सैन्य हमले का भारत पर बहुत गहरा और बहुआयामी असर पड़ सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का लगभग 85% आयात करता है, इसलिए मध्य पूर्व में कोई भी अस्थिरता सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापक आर्थिक स्थिरता को चुनौती देती है। इस भू-राजनीतिक संकट का भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला संभावित असर-

पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर सीधा असर
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत अगर $100 प्रति बैरल के पार जाती है, तो भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की रिफाइनिंग लागत में भारी वृद्धि होगी। यदि सरकार उत्पाद शुल्क में कटौती करके इस झटके को खुद नहीं सहती है, तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में प्रति लीटर ₹5 से ₹10 तक का उछाल आ सकता है। बता दें कि यह महज अनुमान है। सरकार की ओर से कुछ भी आदेश नहीं आया है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूसी तेल का लाभ उठाया था, लेकिन यदि लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में युद्ध के कारण जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो माल ढुलाई और बीमा लागत इतनी बढ़ जाएगी कि कोई भी रियायती तेल अंततः महंगा ही पड़ेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव
डीजल की कीमतें बढ़ने से देश भर में माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो जाएगा। इसका सीधा असर रोजमर्रा की चीजों, एफएमसीजी (FMCG) उत्पादों, फलों और सब्जियों की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे खुदरा महंगाई दर (CPI) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर जा सकती है।
 

Tags: Iran crisistop-news
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