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जल नायक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में जल-आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता मध्यप्रदेश

Insight TV Admin by Insight TV Admin
June 25, 2026
in मध्य प्रदेश
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जल नायक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में जल-आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता मध्यप्रदेश
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जल नायक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में जल-आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता मध्यप्रदेश

भोपाल 

भारतीय संस्कृति में जल को केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का साक्षात स्वरूप और चेतना का प्रतीक माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में 'अपः पुरुषरूपेण' कहकर जल की वंदना की गई है, जिसका सीधा अर्थ है कि जल में ही साक्षात ईश्वर का वास है। इसी पावन और दूरदर्शी सोच को आत्मसात करते हुए यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जल संरक्षण को एक राष्ट्रीय जन आंदोलन का रूप दिया है। उन्होंने जल को विकास का प्रमुख पैमाना बनाते हुए ‘हर घर जल’ के संकल्प को साकार किया। उनके मार्गदर्शन में जल शक्ति मंत्रालय का गठन, जल जीवन मिशन, नमामि गंगे, अमृत सरोवर मिशन और जल शक्ति अभियान जैसी ऐतिहासिक पहलें हुईं, जिन्होंने देश को जल संरक्षण की एक नई दिशा दी। प्रधानमंत्री श्री मोदी के इसी वैश्विक और दूरदर्शी दृष्टिकोण को धरातल पर उतारते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य में जल क्रांति का सूत्रपात किया है। उन्होंने जल संरक्षण को एक सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ाते हुए संस्कृति, आदत और राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बना दिया है, जिसके कारण आज उन्हें संपूर्ण प्रदेश में एक जनप्रिय 'जल नायक' के रूप में देखा जा रहा है।

उज्जैन विकास प्राधिकरण से मुख्यमंत्री पद तक: 22 वर्षों से अधिक का भागीरथ संकल्प

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की जल संपदा को सहेजने और पर्यावरण संरक्षण की यह यात्रा कोई तात्कालिक प्रयास नहीं है, बल्कि इसके पीछे 22 वर्षों से अधिक का अथक परिश्रम, संवेदनशीलता और दूरगामी सोच है। इस यात्रा की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने उज्जैन की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने को अपने जीवन का मुख्य ध्येय बना लिया। महान सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन, उनके नवरत्नों की गौरवशाली परंपरा तथा मालवा की जीवनदायिनी माँ शिप्रा के संरक्षण और जल संवर्धन के प्रति उनकी गहरी आस्था ने एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना को जन्म दिया। उनके द्वारा आरंभ की गयी शिप्रा तीर्थ परिक्रमा धार्मिक आस्था को सशक्त करने के साथ-साथ उज्जैन और शिप्रा नदी से जुड़े सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं पर्यटन महत्व को पुनर्स्थापित कर रही है। इस पहल के माध्यम से शिप्रा के घाटों, तीर्थ स्थलों और प्राचीन परंपराओं को जनभागीदारी से जोड़ते हुए नदी संरक्षण महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार धार्मिक परंपराओं के संरक्षण, स्थानीय अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण तथा जन सामान्य सीधे जुड़ रहा है। एक युवा जननेता के रूप में उन्होंने तत्कालीन समय में ही यह समझ लिया था कि बिना जल स्रोतों के संरक्षण के किसी भी सभ्यता या नगर का विकास दीर्घकालिक नहीं हो सकता और अगर इस चिंता पर समाधान के कार्य नहीं किए गए तो भविष्य के लिए सकंट पैदा होगा। उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री पद तक की अपनी यात्रा में डॉ. मोहन यादव ने हमेशा जल संवर्धन के मुद्दों को शीर्ष प्राथमिकता पर रखा। वे समय-समय पर तत्कालीन मुख्यमंत्रियों और नीति-निर्माताओं को माँ शिप्रा के संरक्षण एवं जल संवर्धन के लिए प्रेरित करते रहे। वर्षों से उनके मन में नदियों और पर्यावरण के प्रति जो संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता रही, वही आज मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में 'जल गंगा संवर्धन अभियान' जैसे विराट जनआंदोलन के रूप में साकार हो रही है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पिछले दो दशकों में जल संरक्षण के जो बीज बोए थे, वे आज एक विशाल वटवृक्ष बनकर पूरे मध्यप्रदेश को अपनी शीतलता और समृद्धि से सराबोर कर रहे हैं। उनकी इसी सजगता, दूरदर्शिता और अटूट निष्ठा ने उन्हें मध्यप्रदेश के 'जल नायक' के रूप में स्थापित किया है।

आस्था की जीवनदायिनी माँ शिप्रा का पुनरुद्धार और अविरल प्रवाह

मध्यप्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है और इसी मायके की सबसे पवित्र और पूजनीय नदियों में से एक है माँ शिप्रा। मालवा की गंगा कही जाने वाली और प्राचीन नगरी अवंती को अपने आंचल में समेटने वाली शिप्रा नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र है। इसी पावन तट पर विश्व प्रसिद्ध 'सिंहस्थ' महापर्व का आयोजन होता है, जहाँ बाबा महाकाल की छत्रछाया में देश-विदेश से आए श्रद्धालु पुण्य लाभ कमाते हैं। परंतु, समय के साथ बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण शिप्रा के आंचल पर प्रदूषण का साया मंडराने लगा था। इंदौर से आने वाली खान नदी और सीवरेज का गंदा पानी इसमें मिलने से इसकी पवित्रता प्रभावित हो रही थी। जब आस्था की इस जीवनदायिनी पर संकट आया, तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे अपनी व्यक्तिगत और शासकीय प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा। इंदौर जिले के निकट काकरी बर्डी पहाड़ी से निकलने वाली 195 किलोमीटर लंबी इस पवित्र नदी को प्रदूषण मुक्त और अविरल बनाना उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प बन गया।

साल 2024 की शुरुआत से ही मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शिप्रा नदी के जीर्णोद्धार के लिए स्वयं कमान संभाली और एक के बाद एक कई उच्च स्तरीय बैठकें कर कड़े निर्णय लिए। उन्होंने 7 जनवरी 2024 को उज्जैन में आयोजित पहली बैठक में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि सीवरेज का गंदा पानी शिप्रा में मिलना तुरंत रोका जाए। इसके लिए उन्होंने सांवेर, रामवासा, पंथपिपलई और राघौपिपल्या में स्टॉपडैम और वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की व्यापक कार्ययोजना तैयार करवाई। टाटा प्रोजेक्ट्स के कार्यों की गहन समीक्षा करते हुए उन्होंने निर्देश दिए कि नृसिंह घाट से लेकर रामघाट तक गंदगी का एक कतरा भी दिखाई नहीं देना चाहिए। इसके बाद 13 फरवरी 2024 को हुई दूसरी बैठक में उन्होंने जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया कि कान्ह नदी के गंदे पानी का ट्रीटमेंट धर्मपुरी से ही शुरू किया जाए और उस साफ किए गए पानी को डायवर्ट कर किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराया जाए, ताकि नदी में केवल शुद्ध जल ही प्रवाहित हो।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की यह मुहिम यहीं नहीं रुकी। उन्होंने 2 जुलाई 2024 को तीसरी उच्च स्तरीय बैठक लेकर प्रगति की समीक्षा की और कार्यों में गति लाने के निर्देश दिए। जल संरक्षण के प्रति उनकी इसी प्रतिबद्धता का परिणाम था कि 1 दिसंबर 2024 को उज्जैन में केंद्रीय मंत्री श्री जेपी नड्डा की गरिमामयी उपस्थिति में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार एक ऐसी अभिनव कार्ययोजना पर काम कर रही है जिससे न्यूनतम लागत में शिप्रा नदी अविरल होगी और आगामी सिंहस्थ-2028 में श्रद्धालु किसी अन्य बाहरी नदी के पानी से नहीं, बल्कि माँ शिप्रा के ही शुद्ध और पावन जल से स्नान करेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने केवल बंद कमरों में निर्देश नहीं दिए, बल्कि स्वयं 'जल गंगा संवर्धन अभियान' के तहत उज्जैन के रामघाट पर हाथों में झाड़ू थामकर स्वच्छता गतिविधियों में हिस्सा लिया और मां शिप्रा का पूजन-अभिषेक कर श्रमदान की अलख जगाई। नदियों के संरक्षण के इसी संकल्प के तहत उन्होंने 26 मई साल 2026 को माँ शिप्रा तीर्थ परिक्रमा में सहभागिता कर नदी को 351 फीट लंबी चुनरी अर्पित की, जिसने पूरे प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक नई दिव्य प्रेरणा का संचार किया।

सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी परियोजना: सिंहस्थ 2028 का दिव्य संकल्प

एक कुशल जल नायक के दूरदर्शी विज़न का ही परिणाम है कि आज मध्यप्रदेश में ₹614.53 करोड़ की भारी-भरकम लागत वाली 'सेवरखेड़ी–सिलारखेड़ी मध्यम सिंचाई परियोजना' पर युद्ध स्तर पर काम चल रहा है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत उज्जैन के ग्राम सेवरखेड़ी में शिप्रा नदी पर एक विशाल बैराज का निर्माण किया जा रहा है। आधुनिक पंपिंग सिस्टम के ज़रिये सिलारखेड़ी जलाशय में पानी इकट्ठा किया जाएगा और आवश्यकतानुसार उसे शिप्रा नदी में छोड़ा जाएगा, जिससे नदी में जल का स्तर हमेशा बना रहेगा। इस भगीरथ प्रयास का लगभग 50 प्रतिशत कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुका है। इस परियोजना से न केवल उज्जैन शहर की पेयजल व्यवस्था सुदृढ़ होगी, बल्कि भविष्य में होने वाले सभी धार्मिक पर्वों पर शिप्रा नदी हमेशा अविरल और निर्मल बहती रहेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मुख्य लक्ष्य सिंहस्थ 2028 के लिए देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को एक अलौकिक और अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करना है। इसके लिए उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे 30 किलोमीटर लंबे आधुनिक और सुविधायुक्त घाटों का निर्माण कार्य अत्यंत तीव्र गति से जारी है। यह भव्य इंफ्रास्ट्रक्चर इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि महापर्व के दौरान 24 घंटे में 5 करोड़ श्रद्धालु बिना किसी असुविधा के सुगमता से पवित्र स्नान कर सकेंगे।

'जल गंगा संवर्धन अभियान': जन आंदोलन से राज्यव्यापी कायाकल्प

भारतीय संस्कृति में यह अनादि काल से माना गया है कि पृथ्वी, पर्वत, नदी और पेड़-पौधों में साक्षात जीवंतता है और वे हमारे लिए परम पूजनीय हैं। जिस प्रकार मानव देह में धमनियों के माध्यम से रक्त का संचार होता है, ठीक उसी प्रकार नदियां भी इस पृथ्वी पर साक्षात जीवन का संचार करती हैं। यही कारण है कि हम सबके अस्तित्व के लिए नदियों का अक्षुण्ण और निरंतर प्रवाह अनिवार्य है। नदियों के प्रवाह को दूषित करना या उनमें मानवीय अवरोध उत्पन्न करना, वास्तव में मानव जीवन की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करने के समान है। इसी पावन और वैज्ञानिक दृष्टि को आत्मसात करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जल स्रोतों के संरक्षण को सर्वोपरि माना और विश्व पर्यावरण दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर 5 जून 2024 को रायसेन जिले के झिरी बहेडा स्थित बेतवा नदी के पावन उद्गम स्थल पर 'जल गंगा संवर्धन अभियान' का भव्य शुभारंभ किया। इस पुनीत अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बेतवा नदी के उद्गम स्थल की वैदिक रीति से पूजा-अर्चना की तथा वहां बरगद का पौधा रोपकर संपूर्ण प्रदेश में इस अभियान को एक महा-आंदोलन का रूप दे दिया।

हाल ही में जारी हुई यूनिसेफ की क्लाइमेट रिस्क रिपोर्ट ने संपूर्ण विश्व को जलवायु परिवर्तन और जल संकट के प्रति सचेत किया है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के करीब 180 करोड़ बच्चे जल संकट और सूखे के सीधे खतरे में हैं, जबकि राष्ट्रीय भूजल सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। ऐसे चिंताजनक वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य में मध्यप्रदेश की स्थिति आज जल नायक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के भगीरथ प्रयासों से काफी सुदृढ़ है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के पारंपरिक जल स्रोतों जैसे नदियों, तालाबों, कुओं, बावड़ियों और चेकडैम का संरक्षण, संवर्धन, गहरीकरण और जीर्णोद्धार करना है।

मध्यप्रदेश में प्राचीन बावड़ियाँ और तालाब हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं, और इनका पुनरुद्धार न केवल जल संकट से मुक्ति दिला रहा है बल्कि हमारे सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित कर पर्यटन को भी बढ़ावा दे रहा है। 'जल गंगा संवर्धन अभियान' के तहत 3,61,001 कार्यों का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से अब तक 2,40,386 कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किए जा चुके हैं। प्रदेश का हर जिला, प्रशासन और वहां का हर नागरिक इस जल संरक्षण महायज्ञ में अपनी सर्वश्रेष्ठ आहुति दे रहा है।

जल संचय जन भागीदारी (JSJB) 2.0: पूरे देश में मध्यप्रदेश और उसके जिलों का शानदार प्रदर्शन

जल शक्ति मंत्रालय के 'जल संचय जन भागीदारी (JSJB) 2.0' डैशबोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, जल संरक्षण के क्षेत्र में मध्यप्रदेश ने देश भर में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। पानी बचाने और जल स्रोतों को सहेजने के पूरे हो चुके कार्यों के आधार पर हमारा मध्यप्रदेश पूरे देश में तीसरे स्थान पर चमक रहा है। राज्य में अब तक 21,90,930 कार्य सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं, जबकि 1,81,506 कार्यों पर अभी तेज़ी से काम चल रहा है। केवल राज्य ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के जिलों ने भी राष्ट्रीय रैंकिंग में बड़ी कामयाबी हासिल की है। भारत के शीर्ष 10 जिलों की सूची में प्रदेश का डिंडोरी जिला तीसरे स्थान पर, खंडवा (पूर्वी निमार) पांचवें स्थान पर और शहडोल जिला नौवें स्थान पर अपनी जगह बनाने में सफल रहा है। शहरों की बात करें तो नगर निगमों की श्रेणी में भी प्रदेश का सुंदर प्रदर्शन रहा है, जिसमें खंडवा नगर निगम ने देश भर में दूसरा स्थान और इंदौर नगर निगम ने पांचवां स्थान पाया है। यह सफलता दर्शाती है कि पानी की हर बूंद को सहेजने के इस पुनीत कार्य में मध्यप्रदेश का प्रशासन और वहां की जनता कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं।

कृषि समृद्धि और जल संचय जनभागीदारी का व्यवहारिक मॉडल

जल नायक मुख्यमंत्री डॉ. यादव के कृषि समृद्धि और जल संचय जनभागीदारी के व्यवहारिक मॉडल जल गंगा संवर्धन अभियान के लिए राज्य सरकार द्वारा 10,475.14 करोड़ रूपये की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की गई है। धरातल पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल-संचय को मजबूती देने के लिए रिकॉर्ड कार्य हुए हैं। इसके तहत राज्य में 65,763 फार्म पॉन्ड (खेत तालाब) का निर्माण कर उन्हें भौतिक रूप से पूर्ण किया गया है, जबकि कूप पुनर्भरण के लिए 96,670 डग वेल रीचार्ज संरचनाएं तैयार की गई हैं। इसके अतिरिक्त, व्यापक स्तर पर जल संरक्षण एवं रीचार्ज से जुड़े 34,488 कार्यों को पूरा किया गया है। जल संकट के दीर्घकालिक समाधान के उद्देश्य से प्रदेश में 208 भव्य अमृत सरोवरों का निर्माण व विकास सुनिश्चित किया गया है, 3,129 पारंपरिक जल संरचनाओं का मरम्मत और रखरखाव कर उन्हें नया जीवन दिया गया। साथ ही 5,448 वॉटरशेड संबंधी कार्यों को सफलता के साथ धरातल पर उतारा गया है।

जल चौपालों और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को कम पानी वाली फसलों, ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिस्टम जैसी तकनीकों के प्रति प्रशिक्षित किया जा रहा है। "प्रति बूंद अधिक फसल" और "कम पानी में अधिक उत्पादन" के इस मंत्र ने न केवल भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है, बल्कि किसानों की लागत को कम कर उनके उत्पादन और आय में वृद्धि की है। यह मॉडल इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि जल नीतियों को जनभागीदारी और कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला जाए, तो वे राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा स्तंभ बन सकती हैं।

'सदानीरा समागम': वैश्विक पटल पर गूंजा मध्यप्रदेश का जल प्रबंधन मॉडल

जल नायक मुख्यमंत्री डॉ. यादव के इन अभिनव और दूरदर्शी प्रयासों की गूंज अब केवल मध्यप्रदेश या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भरपूर सराहना मिल रही है। वीर भारत न्यास द्वारा भोपाल के भारत भवन में आयोजित 'सदानीरा समागम' ने जल संरक्षण को हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ जोड़कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। इस ऐतिहासिक समागम में साइप्रस, फिजी, मेक्सिको, नेपाल, त्रिनिदाद एवं टोबैगो और इक्वाडोर जैसे विभिन्न देशों के राजनयिकों, राजदूतों और नीति विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

समागम में शामिल विदेशी प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा संचालित जल प्रबंधन के 'मध्यप्रदेश मॉडल' को आज की सबसे बड़ी वैश्विक आवश्यकता बताया। उन्होंने जनभागीदारी और शासकीय संकल्प के इस अनूठे समन्वय की भूरि-भूरि प्रशंसा की और इस मॉडल को अपने-अपने देशों में भी लागू करने की तीव्र इच्छा जताई। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर मिली यह स्वीकृति इस बात को प्रमाणित करती है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश जल-आत्मनिर्भरता की दिशा में विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो रहा है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध, सुरक्षित और जल-संपन्न मध्यप्रदेश की सुदृढ़ नींव का संकल्प

जल संरक्षण अब मात्र एक प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामाजिक और नैतिक कर्तव्य बन चुका है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में महिलाओं, युवाओं और कृषकों की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को एक पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी बना दिया है। 'जल गंगा संवर्धन अभियान' और 'जल संचय जनभागीदारी' जैसे प्रयास केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध, सुरक्षित और जल-संपन्न मध्यप्रदेश की सुदृढ़ नींव रख रहे हैं। मध्यप्रदेश आज जल संरचनाओं की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि, नदियों के पुनर्जीवन और पर्यावरण संतुलन के क्षेत्र में देश का एक अनुकरणीय राज्य बन चुका है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के 'जल नायक' के रूप में किए गए ये ऐतिहासिक प्रयास आने वाले समय में स्वर्णिम मध्यप्रदेश के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होंगे। स्वच्छ, समृद्ध और जल-आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का यह सपना तभी पूर्णता को प्राप्त करेगा, जब हर नागरिक इस महा-अभियान से जुड़कर जल की हर बूंद को सहेजने का संकल्प लेगा। आइए, हम सब मिलकर इस जल-आंदोलन के सहभागी बनें और प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री के संकल्पों को सिद्ध कर राज्य को प्रगति के शिखर पर ले जाएं।

 

श्रीराम तिवारी

 

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